माता वैष्णो देवी (mata vaishno davi ) की यात्रा जम्मू कश्मीर (jammu kashmir) राज्य की शीतकालीन राजधानी जम्मू से शुरू होती है। जम्मू देश के सभी भागो से हवाई , सड़क ओर रेल मार्ग से जुडा है । जम्मू पहुचने के बाद यात्रियों को सबसे पहले माता वैष्णो के आधार शिविर कटरा पहुचना होता है । हलाकि कई यात्री जम्मू मे ही ठहरना पसंद करते है ।
यात्रियो की सुविधा के लिये बोर्ड ने रेलवे प्लेटफार्म के करीब वैष्णवी धाम का एक भवन बना रखा है । इसके अतिरिक्त यात्री शहर के होटलों मे भी ठहराते है । स्टेशन से राज्य परिवहन निगम ओर विडियो कोच बसें थोड़े थोड़े अंतराल के बाद रात १२बजे तक उंपलब्ध रहती है । मुख्य बस स्टेंन्ड से भी बस हर 15 मिनट बाद सुबह ६ बजे से रात 8 बजे तक कटरा के लिए बस जाती है । कटरा जम्मू से 50 किलो मीटर दूर है । बस स्टेंन्ड से १० किलो मीटर दूर माँ वैष्णो का पहला दर्शन है , जिस काल- कोड्ली के नाम से जाना जाता है । यह मुख्य सड़क से करीब २० किलो मीटर दूर है , हलाकि इस दर्शन का पुण्य वे ही लोग उठा पते है । जो लोग जम्मू से पैदल यात्रा आरम्भ करते है । बस जम्मू की प्राकृतिक सौँदर्य से भरपूर पहाडियों से गुजरती आधार शिविर कटरा (katra) पहुचती है ।
कटरा एक छोटा किन्तु माँ की भक्ती मे डूबा हुआ क़स्बा है । जो हर यात्री को अपनी ओर खिचता है । चारो तरफ माँ के जय करो की गूंज एक अनूठा अहसास कराती है । कटरा पहुचने पर सबसे पहले यात्रा पर्ची लेने होती है , श्राइन बोर्ड ने बस स्टेंन्ड ओर टैक्स स्टेंन्ड के पास ही के काउन्टृ खोल रखा है । जहा से यात्रियो को पर्ची मुफ़्त दी जाती है , यह काउन्टृ प्रातः ६ बजे से शाम ५ बजे तक खुला रहता है । पर्ची लेने के बाद शुरू होती है , कभी ने भुला देनी वाली रोमांचक , ऊलास ओर भक्ती मे डूबी १३ किलों मीटर वाली लंबी Yatra जिसे ६ भागो मे बँटा गया है । यात्री पर्ची पटल से दर्शनी दरवाजा एक किलों मीटर दूर है , जहाँ यात्री ओटो , बस या रिक्सा से चल कर या फिर पैदल चल कर आते है , यह Ma Vaishno Devi भवन तक जाने का द्वार है , इस लिये इसे दर्शनी दरवाजा कहते है । दर्शनी दरवाजे के बाहर सभी गडियो को रोक दिया जाता है । इस के आगे किसे भी गाडी को जाने की इजाजत नही है , आगे का १२ किलों मीटर लम्बा रास्ता यात्रियो को पैदल तय करना पड़ता है ।
Vaishno Devi श्राइन बोर्ड ने पुर रास्ते मे सीमेँट के टेल लगा रखी है । रास्ते के दोनो ओर सोडियम लाइट लगी है । कुछ यात्री भवन तक पहुचने के लिये घोड़े ओर खचर् या पालकी का सहारा भी लेते है । दर्शनी दरवाजे के कुछ ही दूर बाण गंगा बहती है , यह एक छोटी सी नदी है ।
कहते है कि गुफा कि ओर जाते समय माँ के साथ बहुत से लंगूर भी थे । लंगुरो को बहुत प्यास महसूस हुई , पर आसपास जल का नामो निशां ही नही था , उस वक्त माँ ने लंगूर की प्यास बुझाने के लिये एक तीर जमींन पर चला दिया जहाँ से पानी के फुहारा फट पडा । लंगुरो ने यहा अपनी प्यास बुझाई ओर फिर माँ ने भी कुछ पानी पिया । तभी से यह नदी बहती है । कुछ लोग इसे बाल गंगा भी कहते है , अधिकांश यात्री आगे बढने से पहले बाण गंगा मे स्नान करने का लाभ अवश्य उठाते है , कहते है कि बाण गंगा मे स्नान करने से बहुत से रोग दूर हो जाते है .
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Thursday, September 27, 2007
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